नितिन नवीन के लखनऊ दौरे में दिखा BJP का 2027 का चुनावी ब्लूप्रिंट |

राम मंदिर से लेकर बूथ संगठन, जातीय समीकरण, एनडीए समन्वय और सरकार-संगठन की एकजुटता तक, नितिन नवीन के लखनऊ दौरे ने मिशन-2027 की BJP रणनीति की साफ झलक पेश की
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आता जा रहा है राजनीतिक पार्टियां अपने कील कांटे दुरुस्त करने में जुट गई हैं. BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन का 4 और 5 जुलाई का पहला लखनऊ दौरा इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
दो दिन के इस प्रवास में जितनी राजनीतिक गतिविधियां हुईं, उतने ही राजनीतिक संदेश भी दिए गए. पहली नजर में यह एक सामान्य संगठनात्मक दौरा दिखता है, लेकिन इसकी परतें खोलने पर साफ होता है कि BJP ने इसके जरिए मिशन-2027 की लगभग पूरी रूपरेखा सामने रख दी.

योगी और संगठन की केमिस्ट्री : अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश
लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश BJP में सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे पर रही, वह सरकार और संगठन के बीच कथित दूरी की थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय नेतृत्व के रिश्तों को लेकर भी लगातार राजनीतिक चर्चाएं होती रहीं. विपक्ष ने भी इन चर्चाओं को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. नितिन नवीन के लखनऊ दौरे का पहला और सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश इसी संदर्भ में देखा जा रहा है. मुख्यमंत्री योगी खुद एयरपोर्ट पहुंचे और उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत केसरिया अंगवस्त्र पहनाकर किया. इसके बाद दोनों एक साथ एयरपोर्ट से बाहर निकले.

राम मंदिर से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तक, नितिन नवीन ने चुना आक्रामक वैचारिक रास्ता
नितिन नवीन का लखनऊ दौरा ऐसे समय हुआ, जब अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका था. विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा था और सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक BJP और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को घेरने की कोशिश की जा रही थी.
ऐसे माहौल में यह उम्मीद की जा रही थी कि BJP इस मुद्दे पर रक्षात्मक रुख अपनाएगी लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. लखनऊ में अपने दौरे के दूसरे दिन नितिन नवीन ने सीधे कहा कि "प्रभु श्रीराम के मंदिर के प्रति लोगों की आस्था के साथ किसी को भी छेड़छाड़ करने की इजाजत नहीं दी जाएगी. BJP का प्रत्येक कार्यकर्ता इस आस्था की रक्षा के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार है." नितिन नवीन ने इस विवाद को प्रशासनिक या वित्तीय सवाल के बजाय 'आस्था की रक्षा' के फ्रेम में बदलने की कोशिश की. यानी विपक्ष जहां जवाबदेही की बात कर रहा था, वहीं BJP ने बहस का केंद्र श्रद्धा और धार्मिक भावना को बनाने का प्रयास किया.



