सुप्रीम कोर्ट में ‘थ्री लैंग्वेज पॉलिसी’ पर सुनवाई: क्या अंग्रेज़ी भारत की मुख्य भाषा बन चुकी है?

देश में शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में भाषाओं की भूमिका को लेकर एक बार फिर बहस तेज़ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में तीन-भाषा नीति (थ्री लैंग्वेज पॉलिसी) और अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए। इनमें सबसे प्रमुख सवाल यह रहा कि क्या आज के भारत में अंग्रेज़ी व्यवहारिक रूप से सबसे प्रभावशाली भाषा बन चुकी है और क्या इससे भारतीय भाषाओं की स्थिति प्रभावित हो रही है।
याचिका में तर्क दिया गया कि शिक्षा, न्यायपालिका, सरकारी सेवाओं, उच्च शिक्षा और निजी क्षेत्र में अंग्रेज़ी का वर्चस्व लगातार बढ़ रहा है। इसके कारण ग्रामीण और क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई करने वाले छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और उच्च शिक्षा में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि संविधान की भावना के अनुरूप सभी भारतीय भाषाओं को समान सम्मान और अवसर मिलना चाहिए तथा भाषा किसी भी नागरिक की प्रगति में बाधा नहीं बननी चाहिए।
सुनवाई के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि भारत की भाषाई विविधता देश की सबसे बड़ी ताकत है। संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, जबकि अंग्रेज़ी का उपयोग प्रशासन और न्यायिक कार्यों में विशेष परिस्थितियों में जारी है। इसके साथ ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं को भी विशेष मान्यता प्राप्त है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक हो सकता है, लेकिन मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को शिक्षा एवं शासन व्यवस्था में मजबूत स्थान मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनीं और कहा कि यह विषय केवल एक भाषा का नहीं, बल्कि शिक्षा, समान अवसर और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है। अदालत का अंतिम निर्णय आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि भाषा नीति के संबंध में भविष्य की दिशा क्या होगी। फिलहाल यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है और भाषा, शिक्षा तथा प्रशासन के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर व्यापक बहस जारी है।



