
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में बुधवार को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब Sushmita Dev ने राज्यसभा की सदस्यता और All India Trinamool Congress (टीएमसी) दोनों से इस्तीफा दे दिया। उनके इस कदम को Mamata Banerjee के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। हाल के दिनों में पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और नेताओं के लगातार इस्तीफों के बीच सुष्मिता देव का जाना टीएमसी के लिए एक और चुनौती बनकर उभरा है।
सुष्मिता देव का नाम पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। उनका जन्म 25 सितंबर 1972 को असम के सिलचर में हुआ था। वह कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री Santosh Mohan Dev की पुत्री हैं। उनकी माता Bithika Dev भी राजनीति में सक्रिय रही हैं। इस तरह सुष्मिता देव का राजनीतिक जीवन एक मजबूत राजनीतिक विरासत से जुड़ा रहा है।
उन्होंने University of Delhi से कानून की पढ़ाई की और बाद में ब्रिटेन के King's College London से उच्च शिक्षा प्राप्त की। राजनीति में आने से पहले वह कानून के क्षेत्र से भी जुड़ी रहीं।
सुष्मिता देव ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की। वर्ष 2011 में वह सिलचर विधानसभा सीट से विधायक चुनी गईं। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने असम की सिलचर सीट से जीत दर्ज कर संसद में प्रवेश किया।
कांग्रेस में उनका कद लगातार बढ़ता गया और उन्हें पार्टी की महिला इकाई All India Mahila Congress का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। वह पार्टी नेतृत्व, विशेषकर Rahul Gandhi के करीबी नेताओं में मानी जाती थीं।
हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस के भीतर उनकी सक्रियता कम होती गई और पार्टी नेतृत्व से मतभेदों की चर्चाएं सामने आने लगीं।
अगस्त 2021 में सुष्मिता देव ने कांग्रेस छोड़कर टीएमसी का दामन थाम लिया। उस समय ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल से बाहर पार्टी का विस्तार करने की रणनीति पर काम कर रही थीं। पूर्वोत्तर भारत में संगठन मजबूत करने के लिए सुष्मिता देव को महत्वपूर्ण चेहरा माना गया।
टीएमसी ने उन्हें राज्यसभा भेजा और जल्द ही वह पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र की प्रमुख नेता बन गईं। असम में पार्टी के विस्तार की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंपी गई थी।
10 जून 2026 को सुष्मिता देव ने राज्यसभा और टीएमसी दोनों से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि वह "दो नावों में सवार नहीं रहना चाहतीं", हालांकि उन्होंने अपने फैसले के विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किए।
उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है जब टीएमसी हालिया चुनावी झटकों और आंतरिक असंतोष से जूझ रही है। पार्टी के कई नेताओं के इस्तीफे और बगावत की खबरें पहले से सामने आ रही थीं। सुष्मिता देव का जाना इसी राजनीतिक उथल-पुथल का हिस्सा माना जा रहा है।

इस्तीफे के तुरंत बाद सुष्मिता देव की मुलाकात असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma से होने की खबरों ने राजनीतिक अटकलों को तेज कर दिया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वह जल्द किसी नए राजनीतिक विकल्प की ओर बढ़ सकती हैं। हालांकि उन्होंने अब तक किसी दल में शामिल होने की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
यह अटकल इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि कुछ महीने पहले तक वह हिमंत बिस्वा सरमा की नीतियों की खुलकर आलोचना करती रही थीं।
सुष्मिता देव केवल एक सांसद या पार्टी प्रवक्ता नहीं रही हैं, बल्कि वह बराक घाटी और असम की बंगाली भाषी आबादी के बीच एक प्रभावशाली राजनीतिक चेहरा मानी जाती हैं। कांग्रेस, टीएमसी और अब संभावित नए राजनीतिक अध्याय के बीच उनका सफर यह दिखाता है कि पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में उनका महत्व अभी भी बरकरार है।
सुष्मिता देव का टीएमसी से इस्तीफा केवल एक नेता का पार्टी छोड़ना नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है। कांग्रेस से टीएमसी और अब टीएमसी से अलग होने तक का उनका सफर बताता है कि वह अभी भी राष्ट्रीय और पूर्वोत्तर राजनीति की महत्वपूर्ण हस्तियों में शामिल हैं। आने वाले दिनों में उनका अगला कदम न केवल उनके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा, बल्कि असम और राष्ट्रीय राजनीति के कई समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
स्रोत: विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स एवं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी।


