US Faces 70-80% Drop In Indian Students As Visa Crisis Deepens: Report

Jul 18, 2025, 02:14 PM
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Posted By Dristhikon

US Universities have witnessed a steep drop in Indian student arrivals. Amid the Trump administration's ongoing crisis with international students, education consultants in Hyderabad have noted that outbound traffic has dipped by 70 per cent. The dip stems from the ongoing freeze in visa appointment slots and sudden spike in visa rejection rates.


"By this time usually, most students are done with their visa interviews and are preparing to fly. This year, we're still refreshing the portal every day hoping for a slot to open. It's the worst in years," Sanjeev Rai from Hyderabad Overseas Consultant told the Times of India.


US authorities had promised that visa slots would be released in phases, however there is a lot of obscurity, leaving students anxious. Moreover, students who manage to book slots have not been able to receive confirmation, Ankit Jain from Window Overseas Education Consultancy said, adding that the only logical reason for slots being open without confirming bookings could be the US testing the system.

एआई को लेकर अचानक क्यों फैल रहा है डर?
एआई को लेकर अचानक क्यों फैल रहा है डर?
हाल ही में, एंथ्रोपिक (Anthropic) के डारियो अमोदेई ने AI मॉडल बनाने वाली कंपनियों से "धीमे चलने" का सुझाव दिया, क्योंकि मॉडल डेवलपमेंट की तेज़ी से जोखिम बढ़ रहे हैं। लगभग तुरंत ही, OpenAI के सैम ऑल्टमैन और एलन मस्क ने भी इसका समर्थन किया। इस घटनाक्रम के बाद सरकारों और कई जाने-माने तकनीकी लीडर्स ने भी अपनी राय रखी, जिससे AI सुरक्षा पर एक सक्रिय बहस छिड़ गई। कल, अमेरिकी प्रशासन ने AI के जोखिमों और अवसरों का आकलन करने वाली टास्क फोर्स का नेतृत्व करने के लिए एक नया AI ज़ार (प्रमुख) नियुक्त किया। यह कदम पिछले हफ़्ते कई बड़ी AI कंपनियों के लीडर्स द्वारा साइन किए गए स्वैच्छिक सुरक्षा समझौते के बाद उठाया गया है। घटनाओं का यह सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है। लेकिन, एक आम बिज़नेस लीडर के लिए इसका क्या मतलब है? आपको क्या जानने की ज़रूरत है और आपको क्या करना चाहिए?सबसे पहले, दो तरह की 'धीमी गति' (Slowdowns)ऊपर बताई गई घटनाएँ उन कई घटनाक्रमों में से एक हैं जो अभी चल रहे हैं। यह AI सुरक्षा पर बहस है, और यह हाल की कई घटनाओं से शुरू हुई है, जिसमें Hugging Face पर OpenAI के 'एजेंटिक स्वार्म अटैक' (agentic swarm attack) की चर्चा और एंथ्रोपिक AI रिसर्चर और OpenAI के सुरक्षा कर्मचारी का हालिया इस्तीफ़ा और सार्वजनिक बयान शामिल हैं। इस बहस में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या AI डेवलपमेंट को जानबूझकर धीमा किया जाना चाहिए ताकि AI सुरक्षा पहलुओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके।यह बहस एक और बहस के साथ-साथ चल रही है, जो AI को धीमा करने के बारे में ही है, लेकिन एक बिल्कुल अलग नज़रिए से। AI का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है और कई कंपनियाँ इसमें शामिल हो रही हैं। हालाँकि, हाल की बहसों में AI से मिलने वाले रिटर्न (ROI) को लेकर अलग-अलग राय है; कुछ का कहना है कि ROI सीमित है, जबकि दूसरे इससे असहमत हैं। इस बहस के बीच, कंपनियाँ सोच रही हैं कि क्या उन्हें धीमा हो जाना चाहिए - सुरक्षा कारणों से नहीं, बल्कि रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) की कमी के कारण।चूँकि ये दोनों घटनाक्रम साथ-साथ चल रहे हैं, इसलिए एक के असर और दूसरे के असर के बीच फ़र्क करना मुश्किल है। सिर्फ़ खरीद के फ़ैसलों के अलावा, निवेश पर भी ROI का असर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, 14 सितंबर को अमोदेई के लेख के बाद पहले ट्रेडिंग दिन AI से जुड़े शेयरों में गिरावट आई। उसी दिन, बैंक फ़ॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (Bank for International Settlements) ने टेक सेक्टर में बढ़ते जोखिम के बारे में चेतावनी दी और AI निवेश की मुनाफ़ेदारी और बड़ी टेक कंपनियों के लेवरेज (उधार/कर्ज़) को लेकर चिंता जताई। एक ही समय में एक ही तरह के शेयरों पर दो अलग-अलग खबरें आईं।अलाइनमेंट क्या है?सुरक्षा को लेकर चल रही बहस के बीच, आप अलाइनमेंट के बारे में भी ज़्यादा लेख देख सकते हैं। अलाइनमेंट एक टेक्निकल शब्द है जिसका इस्तेमाल AI रिसर्चर तब करते हैं जब वे यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि AI मॉडल को इंसानी मूल्यों, नियमों और प्रक्रियाओं के हिसाब से कैसे काम करने के लिए तैयार किया जाए। अलाइनमेंट के बारे में ध्यान देने वाली मुख्य बात यह है कि यह रिसर्च का एक जटिल और सक्रिय क्षेत्र है। हालांकि इसमें कुछ प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
स्पेस टेलीस्कोप से मिले 'घोस्ट पार्टिकल्स' के लिए फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला
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Belgian physicist Prof Francis Halzen has won the Nobel Prize in Physics for his pioneering work on an observatory that detects particles from space, shedding light on the distant universe.Halzen led the development of IceCube at the South Pole, which uses a cubic kilometre of Antarctic ice fitted with light sensors to detect particles called neutrinos. These carry information about violent, high-energy processes in the cosmos.The Royal Swedish Academy of Sciences said "his vision and scientific leadership have been fundamental for the IceCube Neutrino Observatory".Halzen first presented his vision for detecting neutrinos at the South Pole in 1988.He told a news conference that he was surprised his idea worked so well."I have to emphasise how lucky I was. Because when we started this project, everybody realised this was maybe a good idea, but very few thought it would work, including myself."
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, दवाओं की कीमतों पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, दवाओं की कीमतों पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों द्वारा कैंसर की दवाओं की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी किए जाने के मामले पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठा कि कुछ दवाएं अस्पतालों में मरीजों को काफी अधिक कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं, जबकि उनकी खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने दवाओं की कीमतों में इस तरह की भारी बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठाए और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को गंभीरता से लिया।कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में महंगी दवाओं का बोझकैंसर का इलाज लंबे समय तक चल सकता है और इसमें महंगी दवाओं, जांच और अस्पताल की सेवाओं पर बड़ी रकम खर्च होती है। ऐसे में यदि दवाओं की कीमतों में कई गुना अंतर हो, तो मरीज और उसके परिवार पर आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक चिंता से जुड़ी रही कि गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान मरीजों को आवश्यक दवाएं उचित और पारदर्शी कीमत पर उपलब्ध होनी चाहिए।दवाओं पर एक समान मार्जिन की चर्चासुनवाई के दौरान सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन रखने की व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। अदालत ने दवाओं की खरीद और बिक्री के बीच कीमतों के अंतर तथा अस्पतालों द्वारा लिए जाने वाले मार्जिन से जुड़े पहलुओं पर ध्यान दिया। इस मामले में अदालत का फोकस इस बात पर रहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को इलाज के दौरान अनावश्यक आर्थिक बोझ का सामना न करना पड़े और दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बनी रहे।मरीजों और परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक सवालकैंसर के इलाज में दवाओं की कीमत एक महत्वपूर्ण खर्च होती है। यदि किसी दवा की कीमत में कई गुना वृद्धि होती है, तो इसका सीधा असर मरीज के परिवार के कुल इलाज खर्च पर पड़ सकता है। खासकर लंबे समय तक इलाज कराने वाले परिवारों के लिए दवाओं की कीमत में छोटा अंतर भी समय के साथ बड़ी राशि में बदल सकता है। इसी वजह से अस्पतालों में दवाओं की कीमत तय करने और मरीजों से वसूली जाने वाली राशि को लेकर पारदर्शिता का मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया है।सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से व्यवस्था पर उठे सवालइस मामले की सुनवाई ने अस्पतालों में दवाओं की बिक्री, खरीद मूल्य और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच अंतर को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को सामने ला दिया है। अदालत की टिप्पणियों के बाद यह सवाल भी चर्चा में है कि गंभीर बीमारियों की दवाओं की कीमतों को लेकर किस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे अस्पतालों और मरीजों दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके।